मिर्ज़ा गालिब की शायरी | 50 Best Mirza Ghalib Shayari Quotes Poetry in Hindi

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#1 - Top 10 Mirza Ghalib Shayari in Hindi 2022


मोहब्बत में नही फर्क जीने और मरने का

उसी को देखकर जीते है जिस ‘काफ़िर’ पे दम निकले!



ये हम जो हिज्र में दीवार-ओ-दर को देखते है।

कभी सबा को, कभी नामाबर को देखते है।।


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ये रश्क है कि वो होता है हमसुख़न हमसे।

वरना ख़ौफ़-ए-बदामोज़ी-ए-अदू क्या है।।



ये ना थी हमारी क़िस्मत कि विसाल-ए-यार होता।

अगर और जीते रहते यही इंतज़ार होता।।


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बना कर फकीरों का हम भेस ग़ालिब

तमाशा-ए-अहल-ए-करम देखते है


#2 - Mirza Ghalib Quotes in Hindi


आईना देख अपना सा मुँह ले के रह गए

साहब को दिल न देने पे कितना ग़ुरूर था



बेवजह नहीं रोता इश्क़ में कोई ग़ालिब

जिसे खुद से बढ़कर चाहो वो रूलाता ज़रूर है


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दिल से तेरी निगाह जिगर तक उतर गई।

दोनों को इक अदा में रज़ामंद कर गई।।



दर्द मिन्नत-कश-ए-दवा न हुआ।

मैं न अच्छा हुआ बुरा न हुआ।।


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मोहब्बत में नहीं है फ़र्क़ जीने और मरने का।

उसी को देख कर जीते है जिस काफ़िर पे दम निकले।।


#3 - Mirza Ghalib Shayari in Hindi


हज़ारों ख़्वाहिशें ऐसी कि हर ख़्वाहिश पे दम निकले।

बहुत निकले मिरे अरमान लेकिन फिर भी कम निकले।।



ये फ़ित्ना आदमी की ख़ाना-वीरानी को क्या कम है

हुए तुम दोस्त जिस के दुश्मन उस का आसमाँ क्यूँ हो


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फिर देखिए अंदाज़-ए-गुल-अफ़्शानी-ए-गुफ़्तार,

रख दे कोई पैमाना-ए-सहबा मिरे आगे



चाहें ख़ाक में मिला भी दे किसी याद सा भुला भी दे,

महकेंगे हसरतों के नक़्श हो हो कर पाए माल भी


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मुहब्बत में उनकी अना का पास रखते हैं,

हम जानकर अक्सर उन्हें नाराज़ रखते हैं


#4 - ग़ालिब की शायरी हिंदी में Motivation


इन आबलों से पाँव के घबरा गया था मैं,

जी ख़ुश हुआ है राह को पुर-ख़ार देख कर



चाँद मत मांग मेरे चाँद जमीं पर रहकर

खुद को पहचान मेरी जान खुदी में रहकर


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ना जाने किस रैन बसेरो की तलाश है इस चाँद को

रात भर बिना कम्बल भटकता रहता है इन सर्द रातो मे



बेसबब मुस्कुरा रहा है चाँद

कोई साजिश छुपा रहा है चाँद


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बेचैन इस क़दर था कि सोया न रात भर

पलकों से लिख रहा था तेरा नाम चाँद पर


#5 - मिर्जा गालिब दर्द शायरी in Hindi


खूबसूरत गज़ल जैसा है तेरा चाँद सा चेहरा

निगाहे शेर पढ़ती हैं तो लब इरशाद करते है



आह को चाहिए इक उम्र असर होते तक

कौन जीता है तेरी ज़ुल्फ़ के सर होते तक


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वो आए घर में हमारे, खुदा की क़ुदरत है

कभी हम उनको, कभी अपने घर को देखते है



इश्क़ पर जोर नहीं है ये वो आतिश ‘ग़ालिब‘

कि लगाये न लगे और बुझाये न बुझे


-


हम भी दुश्मन तो नहीं है अपने

ग़ैर को तुझसे मोहब्बत ही सही


#6 - ग़ालिब प्रेम शायरी


हम जो सबका दिल रखते है

सुनो, हम भी एक दिल रखते है



रगों में दौड़ते फिरने के हम नहीं क़ायल

जब आँख ही से न टपका तो फिर लहू क्या है


-


पियूँ शराब अगर ख़ुम भी देख लूँ दो चार

ये शीशा-ओ-क़दह-ओ-कूज़ा-ओ-सुबू क्या है



रही न ताक़त-ए-गुफ़्तार और अगर हो भी

तो किस उम्मीद पे कहिये के आरज़ू क्या है


-


नज़र लगे न कहीं उसके दस्त-ओ-बाज़ू को

ये लोग क्यूँ मेरे ज़ख़्मे जिगर को देखते हैं


#7 - मिर्ज़ा ग़ालिब शायरी इन हिंदी पीडीएफ


हाथों की लकीरों पे मत जा ऐ गालिब

नसीब उनके भी होते हैं जिनके हाथ नहीं होते



दर्द जब दिल में हो तो दवा कीजिए

दिल ही जब दर्द हो तो क्या कीजिए


-


न था कुछ तो ख़ुदा था कुछ न होता तो ख़ुदा होता

डुबोया मुझ को होने ने न होता मैं तो क्या होता



हैं और भी दुनिया में सुख़न-वर बहुत अच्छे

कहते हैं कि 'ग़ालिब' का है अंदाज़-ए-बयाँ और


-


हज़ारों ख़्वाहिशें ऐसी कि हर ख़्वाहिश पे दम निकले

बहुत निकले मिरे अरमान लेकिन फिर भी कम निकले


#8 - मिर्ज़ा ग़ालिब शायरी इन उर्दू


कितना ख़ौफ होता है शाम के अंधेरों में

पूछ उन परिंदों से जिनके घर नहीं होते



मोहब्बत में नहीं है फ़र्क़ जीने और मरने का

उसी को देख कर जीते हैं जिस काफ़िर पे दम निकले


-


क़र्ज़ की पीते थे मय लेकिन समझते थे कि हां

रंग लावेगी हमारी फ़ाक़ा-मस्ती एक दिन



आह को चाहिए इक उम्र असर होते तक

कौन जीता है तिरी ज़ुल्फ़ के सर होते तक


-


दर्द मिन्नत-कश-ए-दवा न हुआ।

मैं न अच्छा हुआ बुरा न हुआ


#9 - मिर्जा गालिब के दोहे


दिल से तेरी निगाह जिगर तक उतर गई

दोनों को इक अदा में रज़ामंद कर गई



इशरत-ए-क़तरा है दरिया में फ़ना हो जाना

दर्द का हद से गुज़रना है दवा हो जाना


-


इश्क़ पर जोर नहीं है ये वो आतिश 'ग़ालिब'

कि लगाये न लगे और बुझाये न बुझे



दिल-ए-नादाँ तुझे हुआ क्या है।

आख़िर इस दर्द की दवा क्या है


-


काबा किस मुँह से जाओगे 'ग़ालिब'।

शर्म तुम को मगर नहीं आती


#10 - मिर्जा गालिब गजल


उन के देखे से जो आ जाती है मुँह पर रौनक़

वो समझते हैं कि बीमार का हाल अच्छा है



है कुछ ऐसी ही बात जो चुप हूँ

वर्ना क्या बात करनी नहीं आती


-


हुई मुद्दत कि ‘ग़ालिब’ मर गया पर याद आता है

वो हर इक बात पर कहना कि यूँ होता तो क्या होता



क़ासिद के आते आते ख़त इक और लिख रखूँ

मैं जानता हूँ जो वो लिखेंगे जवाब में


-


हम न बदलेंगे वक़्त की रफ़्तार के साथ

जब भी मिलेंगे अंदाज पुराना होगा


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