फ़ैज़ अहमद फ़ैज़ की शायरी | 50 Best Faiz Ahmed Faiz Shayari Quotes Poetry in Hindi

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#1 - Top 10 Faiz Ahmed Faiz Shayari in Hindi 2022


दोनों जहां तेरी मोहब्बत में हार के 

वो जा रहा है कोई शब-ए-गम गुज़ार के 



न गुल खिले हैं न उन से मिले न मय पी है

अजीब रंग में अब के बहार गुज़री है


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तेरे क़ौल-ओ-क़रार से पहले

अपने कुछ और भी सहारे थे



इक फ़ुर्सत-ए-गुनाह मिली वो भी चार दिन

देखे हैं हम ने हौसले परवरदिगार के


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ये आरज़ू भी बड़ी चीज़ है मगर हमदम

विसाल-ए-यार फ़क़त आरज़ू की बात नहीं


#2 - Faiz Ahmed Faiz Quotes in Hindi


दुनिया ने तेरी याद से बेगाना कर दिया

तुझ से भी दिल-फ़रेब हैं ग़म रोज़गार के



हम परवरिश-ए-लौह-ओ-क़लम करते रहेंगे

जो दिल पे गुज़रती है रक़म करते रहेंगे 


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मक़ाम 'फ़ैज़' कोई राह में जचा ही नहीं

जो कू-ए-यार से निकले तो सू-ए-दार चले



न जाने किस लिए उम्मीद-वार बैठा हूँ

इक ऐसी राह पे जो तेरी रहगुज़र भी नहीं


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इक तर्ज़-ए-तग़ाफ़ुल है सो वो उन को मुबारक

इक अर्ज़-ए-तमन्ना है सो हम करते रहेंगे


#3 - Faiz Ahmed Faiz Poetry in Hindi


ज़िंदगी क्या किसी मुफ़लिस की क़बा है जिस में

हर घड़ी दर्द के पैवंद लगे जाते हैं



आए तो यूँ कि जैसे हमेशा थे मेहरबान

भूले तो यूँ कि गोया कभी आश्ना न थे


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गुलों में रंग भरे बाद-ए-नौ-बहार चले

चले भी आओ कि गुलशन का कारोबार चले



नहीं निगाह में मंज़िल तो जुस्तुजू ही सही

नहीं विसाल मयस्सर तो आरज़ू ही सही


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वो बात सारे फ़साने में जिस का ज़िक्र न था

वो बात उन को बहुत ना-गवार गुज़री है


#4 - फैज अहमद फैज कविता कोश


तुम्हारी याद के जब ज़ख़्म भरने लगते हैं

किसी बहाने तुम्हें याद करने लगते हैं



दोनों जहान तेरी मोहब्बत में हार के

वो जा रहा है कोई शब-ए-ग़म गुज़ार के


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और क्या देखने को बाक़ी है

आप से दिल लगा के देख लिया



आए कुछ अब्र कुछ शराब आए

इस के बाद आए जो अज़ाब आए


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अब जो कोई पूछे भी तो उस से क्या शरह-ए-हालात करें

दिल ठहरे तो दर्द सुनाएँ दर्द थमे तो बात करें


#5 - Best Of Faiz Ahmad Faiz


इक गुल के मुरझाने पर क्या गुलशन में कोहराम मचा

इक चेहरा कुम्हला जाने से कितने दिल नाशाद हुए



कर रहा था ग़म-ए-जहाँ का हिसाब

आज तुम याद बे-हिसाब आए


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उतरे थे कभी 'फ़ैज़' वो आईना-ए-दिल में

आलम है वही आज भी हैरानी-ए-दिल का



दिल ना-उमीद तो नहीं नाकाम ही तो है

लम्बी है ग़म की शाम मगर शाम ही तो है


-


और भी दुख हैं ज़माने में मोहब्बत के सिवा

राहतें और भी हैं वस्ल की राहत के सिवा


#6 - फैज की शायरी हम देखेंगे


कभी-कभी याद में उभरते हैं, नक़्शे-माज़ी मिटे-मिटे से

वो आज़माइश दिलो-नज़र की, वो क़ुरबतें-सी, वो फासले से

कभी-कभी आरज़ू के सहरा में आ के रुकते हैं क़ाफ़िले से

वो सारी बातें लगाव की सी, वो सारे उनवां विसाल के से

निगाहो-दिल को क़रार कैसा, निशातो-ग़म में कमी कहां की

वो जब मिले हैं तो उनसे हर बार, की है उल्फ़त नये सिरे से



ज़िक्रे-दोज़ख़, बयाने-हूर-ओ-कुसूर

बात गोया यहीं कहीं की है

अश्क़ तो कुछ भी रंग ला न सके

ख़ूँ से तर आज आस्तीं की है

कैसे मानें हरम के सहल-पसंद

रस्म जो आशिक़ों के दीं की है

‘फ़ैज़’ औजे-ख़याल से हमने

आसमाँ सिंध की ज़मीं की है


-


तेरी सूरत जो दिलनशीं की है

आशना शक्ल हर हसीं की है

हुस्न से दिल लगा के हस्ती की

हर घड़ी हमने आतशीं की है

सुबहे-गुल हो कि शामे-मैख़ाना

मदह उस रू-ए-नाज़नीं की है

शैख़ से बे-हिरास मिलते हैं

हमने तौबा अभी नहीं की है



गरानी-ए-शबे-हिज्राँ दुचंद क्या करते

इलाजे-दर्द तेरे दर्दमंद क्या करते

वहीं लगी है जो नाज़ुक मकाम थे दिल के

ये फ़र्क़ दस्ते-अदू के गज़ंद क्या करते

जगह-जगह पे थे नासेह तो कू-ब-कू दिलबर

इन्हें पसंद, उन्हें नापसंद क्या करते


-


मुझ से पहली सी मोहब्बत मेरे महबूब न मांग

मैने समझा था कि तू है तो दरख़्शां है हयात

तेरा ग़म है तो ग़मे-दहर का झगड़ा क्या है

तेरी सूरत से है आलम में बहारों को सबात

तेरी आँखों के सिवा दुनिया मे रक्खा क्या है

तू जो मिल जाये तो तक़दीर निगूँ हो जाये

यूँ न था, मैने फ़क़त चाहा था यूँ हो जाये


#7 - फ़ैज़ अहमद फ़ैज़ की नज़्म


दिल में अब, यूँ तिरे भूले हुए ग़म आते हैं

जैसे बिछड़े हुये का’बे में सनम आते हैं

एक-इक कर के हुए जाते हैं तारे रौशन

मेरी मंज़िल की तरफ़ तेरे क़दम आते हैं

रक़्से-मय तेज़ करो, साज़ की लय तेज़ करो

सू-ए-मयख़ानः सफ़ीराने-हरम आते हैं



हम जीते जी मसरूफ रहे

कुछ इश्क़ किया, कुछ काम किया

काम इश्क के आड़े आता रहा

और इश्क से काम उलझता रहा

फिर आखिर तंग आ कर हमने

दोनों को अधूरा छोड दिया


-


ये वो सहर तो नहीं जिसकी आरज़ू लेकर

चले थे यार कि मिल जाएगी कहीं न कहीं

फ़लक के दश्त में तारों की आख़िरी मंज़िल

कहीं तो होगा शब-ए-सुस्त मौज का साहिल

कहीं तो जाके रुकेगा सफ़ीना-ए-ग़मे-दिल



न गुल खिले हैं न उन से मिले न मय पी है

अजीब रंग में अब के बहार गुज़री है

न जाने किस लिए उम्मीद-वार बैठा हूँ

इक ऐसी राह पे जो तेरी रहगुज़र भी नहीं


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यह बाजी इश्क की बाजी है जो चाहे लगा दो डर कैसा

गर जीत गये तो कहना क्या, हारे भी तो बाजी मात नही


#8 - फ़ैज़ अहमद नामचीन शायरी


सुर्ख़ फूलों का, दहकते हुए गुलज़ार का रंग

ज़हर का रंग, लहू-रंग, शबे-तार का रंग

आसमाँ, राहगुज़र, शीशा-ए-मय

कोई भीगा हुआ दामन, कोई दुखती हुई रग

कोई हर लहज़ा बदलता हुआ आईना है

अब जो आए हो तो ठहरो कि कोई रंग, कोई रुत, कोई शै

एक जगह पर ठहरे

फिर से इक बार हर इक चीज़ वही हो कि जो है

आसमाँ हद्दे-नज़र, राहगुज़र राहगुज़र, शीशा-ए-मय शीशा-ए-मय



तुम न आए थे तो हर चीज़ वही थी कि जो है

आसमाँ हद्दे-नज़र, राहगुज़र राहगुज़र, शीशा-ए-मय शीशा-ए-मय

और अब शीशा-ए-मय, राहगुज़र, रंगे-फ़लक

रंग है दिल का मेरे “ख़ून-ए-जिगर होने तक”

चंपई रंग कभी, राहते-दीदार का रंग

सुरमई रंग की है सा’अते-बेज़ार का रंग

ज़र्द पत्तों का, खस-ओ-ख़ार का रंग


-


रक़्स-ए-मय तेज़ करो, साज़ की लय तेज़ करो

सू-ए-मैख़ाना सफ़ीरान-ए-हरम आते हैं

कुछ हमीं को नहीं एहसान उठाने का दिमाग

वो तो जब आते हैं माइल-ब-करम आते हैं



हम परवरिश-ए-लौह-ओ-क़लम करते रहेंगे

जो दिल पे गुज़रती है रक़म करते रहेंगे

हम सहल-तलब कौन से फ़रहाद थे लेकिन

अब शहर में तेरे कोई हम सा भी कहाँ है


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अनगिनत सदियों के तारीक बहीमाना तिलिस्म

रेशम-ओ-अतलस-ओ-कमख़्वाब में बुनवाए हुए

जा-ब-जा बिकते हुए कूचा-ओ-बाज़ार में जिस्म

ख़ाक में लिथड़े हुए, ख़ून में नहलाए हुए

जिस्म निकले हुए अमराज़ के तन्नूरों से

पीप बहती हुई गलते हुए नासूरों से


#9 - फैज अहमद फैज शायरी कोश


मैंने समझा था कि तू है तो दरख़्शाँ है हयात

तेरा ग़म है तो ग़मे-दहर का झगड़ा क्या है

तेरी सूरत से है आलम में बहारों को सबात

#तेरी आँखों के सिवा दुनिया में रक्खा क्या है?



अब वही हर्फ़े-जुनूं सबकी ज़बां ठहरी है

जो भी चल निकली है, वो बात कहां ठहरी है

आज तक शैख़ के इकराम में जो शै थी हराम

अब वही दुश्मने-दीं राहते-जां ठहरी है


-


हमारे खून बहे जो बाग़ उजड़े

जो गीत दिलों में कत्ल हुए

हर कतरों का हर गुंचे का

#हर गीत का बदला मांगेगे



इस तरह अपनी ख़ामशी गूँजी

गोया हर सिम्त से जवाब आए

‘फ़ैज़’ थी राह सर-ब-सर मंज़िल

हम जहाँ पहुँचे कामयाब आए


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हुज़ूर-ए-यार हुई दफ़्तर-ए-जुनूं की तलब

गिरह में लेके गरेबां का तार-तार चले

मुक़ाम ‘फ़ैज़’ कोई राह में जंचा ही नहीं

जो कू-ए-यार से निकले तो सू-ए-दार चले


#10 - फ़ैज़ अहमद फ़ैज़ गीत


मिरी चश्म-ए-तन-आसाँ को बसीरत मिल गई जब से

बहुत जानी हुई सूरत भी पहचानी नहीं जाती

फिर नज़र में फूल महके दिल में फिर शमएँ जलीं

फिर तसव्वुर ने लिया उस बज़्म में जाने का नाम



हम मेहनत कश जगवालों से जब अपना हिस्सा मांगेगे

#हम मेहनत कश जगवालों से जब अपना हिस्सा मांगेगे

एक खेत नहीं, एक देश नहीं

हम सारी दुनिया मांगेगे


-


बोल कि लब आज़ाद हैं तेरे

#बोल ज़ुबां अब तक तेरी है

तेरा सुतवां जिस्म है तेरा

बोल कि जाँ अब तक् तेरी है



इक तर्ज़-ए-तग़ाफ़ुल है सो वो उन को मुबारक

#इक अर्ज़-ए-तमन्ना है सो हम करते रहेंगे

कब ठहरेगा दर्द ऐ दिल कब रात बसर होगी

सुनते थे वो आएँगे सुनते थे सहर होगी


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गुलों में रंग भरे बाद-ए-नौबहार चले

चले भी आओ कि गुलशन का कारोबार चले

क़फ़स उदास है, यारो सबा से कुछ तो कहो

कहीं तो बहर-ए-ख़ुदा आज ज़िक्र-ए-यार चले


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